Why are Muslims not included in the citizenship amendment bill?नागरिकता संशोधन बिल में मुसलमानों को शामिल क्यों नहीं किया गया है?

Why are Muslims not included in the citizenship amendment bill?

Why are Muslims not included in the citizenship amendment bill?नागरिकता संशोधन बिल में मुसलमानों को शामिल क्यों नहीं किया गया है?

नागरिकता संशोधन बिल ( CAB ) = शरणार्थीयों की समस्या का समाधान करता है।

नेशनल सिटिजन रजिस्टर ( NRC) = घुसपेठियो का भारत में बसना सुनिश्चित करता है।

( CAB + NRC ) + ( Paid Media ) = यह भ्रम फैला रहा है कि भारतीय मुस्लिम शहरियों की नागरिकता संकट में आ सकती है !!

.इस मामले पर कोई राय बनाने से पहले हमें यह तय करना चाहिए कि आप किसे शरणार्थी कहते है और किसे घुसपेठिया !! नागरिकता संशोधन बिल के बारे में विभिन्न लोगो की राय भिन्न होने की एक वजह यह है कि शरणार्थी एवं घुसपेठिया की उनकी परिभाषाओ में भिन्नता है। दूसरी वजह सियासी है - क्योंकि पेड मीडिया CAB को NRC के साथ मिक्स करके भारतीय मुस्लिमो में पैनिक खड़ा कर रहा है, ताकि बीजेपी=संघ की हिंदूवादी छवि को मजबूत किया जा सके !!

( इस जवाब में 3 खंड है। खंड – A शर्णार्थियो एवं घुसपेठियो की 4 दशक पुरानी समस्या का संक्षिप्त विवरण। खंड – B नागरिक संशोधन बिल CAB के बारे में है। खंड – C में NRC के बारे में बताया गया है। आप खंड A की अवहेलना कर सकते है। )

.खंड - A

                    https://www.hindustantimes.com/rf/image_size_960x540

.(1) समस्या की पृष्ठभूमि :

.बांग्लादेश और भारत की जनसंख्या वृद्धि, धार्मिक आंकड़ों एवं सरकारी प्रशासकीय सूत्रों के अनुसार भारत में अवैध बांग्लादेशियों की संख्या 2 करोड़ के आस पास है। इसमें से अधिकांश बांग्लादेश के साथ सीमा से लगे राज्यों में बस गए, और कुछ बाद में देश के दूरदराज कोनों सहित भारत के अन्य शहरो में जाकर सेट हो गए है।.

इतनी बड़ी संख्या में अवैध बांग्लादेशीयों के आने से सीमावर्ती राज्यों के आर्थिक संसाधनों पर दबाव बढ़ा और भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में धार्मिक जनसंख्या में भी बदलाव आने लगा। और इस वजह से बाहरी बांग्लादेशीयों एवं स्थानीय भारतीयों में स्थानीय स्तर पर घर्षण बढ़ गया। चूंकि इन बांग्लादेशियों के पास कोई रोजगार वगेरह नहीं था अत: इसमें से एक बड़ा वर्ग महानगरो में सस्ता श्रम करने लगा और फिर वहां पर इन्होने गिरोह बनाकर अपराध करना भी शुरू कर दिए।

1998 में असम के गवर्नर एस के सिन्हा ने सरकार को जो रिपोर्ट भेजी उसमे कहा गया था कि -

Assam was first claimed by Pakistan during 1947 and then by Bangladesh, due to its rich natural resources. The report raised worries about what might happen if the illegal immigrants gain majority and ask for secession from India. He also cited the "Greater Bangladesh project" which might entice the immigrants to merge those regions of Assam with Bangladesh.

The rapid growth of international Islamic fundamentalism may provide the driving force for this demand. The loss of lower Assam will severe the entire North-East from the rest of India and the rich natural resources of that region will be lost to the nation. — Srinivas Kumar Sinha.

अपने समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों के कारण असम पर 1947 के दौरान पाकिस्तान द्वारा एवं बाद में बांग्लादेश द्वारा दावा किया गया था । रिपोर्ट में इस बात को लेकर चिंता जताई गई कि अवैध अप्रवासी बहुमत हासिल करने के बाद भारत से अलगाव की मांग पर आंदोलन खड़ा कर सकते है। उन्होंने "ग्रेटर बांग्लादेश प्रोजेक्ट" का भी हवाला दिया जो असम के उन क्षेत्रों को बांग्लादेश में विलय करने के लिए अप्रवासियों को लुभा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक कट्टरवाद का तेजी से विकास इस मांग को उकसा सकता है। निचले असम का नुकसान पूरे पूर्वोत्तर को शेष भारत से काट देगा और हम उस क्षेत्र के समृद्ध प्राकृतिक संसाधन खो देंगे - श्रीनिवास कुमार सिन्हा।     

                   https://en.wikipedia.org/wiki/2012_Assam_violence

2001 में भारत के गृह मंत्री ने संसद में स्वीकार किया कि रिपोर्ट्स के अनुसार लगभग 1.5 करोड़ अवैध बांग्लादेशी घुसपेठीये भारत में है। 2008 से 2010 के बीच भारत की ख़ुफ़िया एजेंसियों एवं BSF ने रिपोर्ट भेजी कि बांग्लादेशी अवैध घुसपैठ भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है, और नतीजतन पूर्वोत्तर में बड़े पैमाने पर नागरिक हिंसा शुरू हो सकती है।

2012 में बांग्लादेशी घुसपेठियो ने 2 लाख स्थानीय नागरिको को कोकराझार इलाके से खदेड़ दिया। लगभग 5 लाख लोग इस दंगे की चपेट में आये और लगभग 3 लाख भारतीय लोगो को राहत कैम्पों में शरण लेनी पड़ी !!

बाद में 2013 से रोहिंग्ये भारत में आने लगे और ये 2017 तक आते चले गए। एक अनुमान के मुताबिक पिछले 8 साल में लगभग 1 से 1.5 लाख रोहिंग्ये भारत में आ चुके है। सरकारी आंकड़ा 60 हजार के आस पास का है।

(2) राजनैतिक पार्टियों का इस समस्या पर स्टेण्ड :

कांग्रेस एवं मुख्य धारा की अन्य पार्टियों के लिए ये कभी कोई मुद्दा नहीं रहा। उनके लिए इसमें पैसा भी है और वोट भी है। सऊदी अरब से वे पैसा ले लेते है, और घुसपेठियो के वोटर कार्ड बनवाकर इन्हें अपना वोटर बना लेते है !! बीजेपी=संघ को छोड़कर मुख्यधारा की किसी भी पार्टी को आप इस प्रश्न पर बात करते नहीं पायेंगे।

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बीजेपी का इस मुद्दे पर स्टेंड था कि यदि हम सत्ता में आये तो इन्हें खदेड़ दिया जाएगा। यह 1998 के आस पास की बात है तब बीजेपी=संघ की स्थानीय मीटिंग वगेरह में भी इस समस्या पर काफी डिस्कसन होती थी। तब मैं भी बीजेपी=संघ में था, और बीजेपी=संघ के कार्यकर्ता यह मानते थे कि यह भारत की एक गंभीर समस्या है। वाजपेयी / आडवाणी से इस बारे में उम्मीद थी। वाजपेयी ने 6 साल तक सरकार चलायी, किन्तु उन्होंने घुसपेठियो को चिन्हित करने एवं खदेड़ने के लिए गेजेट में कुछ नहीं छापा।

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2004 में जब कोंग्रेस सत्ता में आ गयी तो बीजेपी=संघ के नेताओं ने फिर से इस मुद्दे को उठाना शुरू किया। 2012 में होने वाली हिंसा के बाद यह मुद्दा बीजेपी की लिस्ट में और ऊपर चढ़ा। 2014 के चुनाव में मोदी साहेब ने अपनी रैलियों में अलग अलग जगहों पर 5 बार यह वादा किया कि यदि वे सत्ता में आये तो बांग्लादेशी घुसपेठियो को खदेड़ देंगे। किन्तु जब मोदी साहेब सत्ता में आये तो उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में इस समस्या का समाधान करने के लिए गेजेट में एक भी इबारत नहीं छापी।

उलटे उन्होंने जब आधार कार्ड लागू किया तो इसमें यह घोषणा जोड़ने के इनकार कर दिया कि — मैं यह शपथपूर्वक घोषणा करता हूँ कि मैं भारत का नागरिक हूँ !! इसकी वजह से जिन घुसपेठियो के पास वोटर कार्ड थे उन्होंने अपने आधार कार्ड भी बनवाने शुरू कर दिए, और इसके लिए उन्हें कोई क़ानून भी नहीं तोडना पड़ा !! पूर्वोत्तर ( बंगाल , असम ) में यह समस्या कॉमन नोलेज में है और वहां पर काफी नागरिक समूह इस समस्या का समाधान करने की मांग दशको से कर रहे है। शेष भारत में इस समस्या के बारे में सिर्फ कार्यकर्ताओ तक ही जानकारी है, आम मतदाता इस समस्या के अनभिग्य है। वजह — पेड मीडिया !! पेड मीडिया इस समस्या को रिपोर्ट नहीं करता !!

दूसरे शब्दों में, हमारे पास लगभग 2 करोड़ बांग्लादेशी / रोहिंग्ये है। माना जाता है कि इनमे लगभग 80% बांग्लादेशी मुस्लिम एवं 20% के आस पास हिन्दू समेत अन्य धर्मो के लोग है। 

समस्या : इनमे कई समूह इस्लामिक कट्टरपंथी भी है, कई समूह अपराधों / तस्करी में भी मुब्तिला है, कई समूहों का बांग्लादेश / नक्सलियों के साथ नेटवर्क बना हुआ है। इनका जमाव पूर्वोत्तर एवं दूर दराज इलाको में है। पूरे भारत में भी ये फैले हुए है। चीन एवं बांग्लादेश यदि इस नेटवर्क में अपने लोगो को पैसा और हथियार भेजना शुरू करें तो ये पूर्वोत्तर में लॉ एवं ऑर्डर को फ़ैल कर सकते है, और वे ऐसा करके भी दिखा चुके है। लेकिन इनमे कई समूह सामान्य भी है। वे रोजगार की तलाश में यहाँ आये और आने के बाद यहाँ बस गए।

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इनके पास आधार कार्ड से लेकर राशन कार्ड, लाइसेंस, बिजली-पानी के बिल आदि सभी दस्तावेज है। इनकी कद काठी भारतीयों जैसी है, और भाषा भी यह बांग्ला बोलते है। तो इनको बाहर निकालने में समस्या इन्हें चिन्हित करना है। इनके पास सऊदी अरब के स्पोंसर भी है जो भारत के मीडिया हाउस को इनके पक्ष में सकारात्मक कवरेज के लिए भुगतान करते है ।

और सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनके पास वोटर कार्ड है !! मतलब जब आप इन्हें खदेड़ने जायेंगे तो स्थानीय नेता इन्हें प्रोटेक्ट करने के लिए सड़को पर आ जायेंगे !! दुसरे शब्दों में इनके पास स्थानीय स्तर पर राजनैतिक ताकत है !!

मेरा मानना है कि यदि कोई व्यक्ति CAB एवं NRC पर राय बनाता है तो उसे पहले यह बताना चाहिए कि हमें 2 करोड़ के इस झुण्ड का क्या करना है। इसमें से किसे / कितनो को किस आधार पर रखना है, और किसे / कितनो को किस आधार पर भारत से बाहर निकालना है। जिसे हम शरणार्थी मानेंगे उन्हें भारत में शरण मिल जाएगी और जिन्हें हम घुसपेठिया कहेंगे उन्हें खदेड़ दिया जाएगा।

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और इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जिन्हें खदेड़ना है उसके लिए किस प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाए। मतलब इसके लिए हमें गेजेट में क्या छापना है !! यदि आप इस प्रश्न की अवहेलना करते है या इस बात को टाल देते है कि 2 करोड़ के इस झुण्ड का मामला निपटाने के लिए हमें गेजेट में क्या छापना है तो इसका मतलब यह है कि आप इस समस्या का समाधान करने के प्रति गंभीर नहीं है। और इसका मतलब यह भी है कि आप इस समस्या को बनाए रखना चाहते है, और इस तरह आप इन विदेशी अवैध घुसपैठियों को भारत में टिकाए रखना चाहते है !!

खंड - B

(1) नागरिकता संशोधन बिल ( CAB ) :

बीजेपी=संघ ने जब गेजेट में CAB की इबारत छापी तो उन्होंने उन्होंने ऊपर दी गयी समस्या के एक हिस्से का समाधान करने के लिए स्टेंड लिया है । यह बहस की बात है कि इससे किस तरह के बदलाव आयेंगे। किन्तु जो भी लोग / पार्टी / समूह / बुद्धिजीवी आदि CAB का विरोध कर रहे है किन्तु 2 करोड़ के इस झुण्ड ( शरणार्थी + घुसपेठिया ) की समस्या को एड्रेस करने से इनकार कर देते है, मैं उन्हें सुनने से इनकार कर देता हूँ।

CAB के ड्राफ्ट में 4 धाराएं है। गेजेट में प्रकाशित होने के साथ ही ये 4 धाराएं इन्डियन सिटिजन एक्ट 1955 में जुड़ जायेगी।  

बिल का का पीडीऍफ़ यहाँ से डाउनलोड कर सकते है :http://egazette.nic.in/WriteReadData/2019/214646.pdf  

1. (1) This Act may be called the Citizenship (Amendment) Act, 2019.

(2) It shall come into force on such date as the Central Government may, by notification in the Official Gazette, appoint.

2. In the Citizenship Act, 1955 (hereinafter referred to as the principal Act), in section 2, in sub-section (1), after clause (b), the following provisos shall be inserted, namely:—

“Provided that persons belonging to minority communities, namely, Hindus, Sikhs, Buddhists, Jains, Parsis and Christians from Afghanistan, Bangladesh and Pakistan, who have been exempted by the Central Government by or under clause (c) of sub-section (2) of section 3 of the Passport (Entry into India) Act, 1920 or from the application of the provisions of the Foreigners Act, 1946 or any order made thereunder, shall not be treated as illegal migrants for the purposes of that Act:

Provided further that on and from the date of commencement of the Citizenship (Amendment) Act, 2019, any proceeding pending against any person referred to in the first proviso shall be abated and such person shall be eligible to apply for naturalisation under section 6.”

3. Provision for “Overseas Citizen of India Cardholder”

4. In the principal Act, in the Third Schedule, in clause (d), the following provison shall be inserted, namely:— “Provided that for the persons belonging to minority communities, namely, Hindus, Sikhs, Buddhists, Jains, Parsis and Christians from Afghanistan, Bangladesh and Pakistan, the aggregate period of residence or service of a Government in India as required under this clause shall be read as “not less than six years” in place of “not less than eleven years”.’

धारा 2 कहती है — "अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित व्यक्ति - हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई ...... "

इस संशोधन की मंशा अल्पसंख्यको को पनाह देने की है। ऐसे धार्मिक समुदाय जो पाकिस्तान, अफगानिस्तान एवं बांग्लादेश में अल्पसंख्यक है, और इस वजह से उन्हें उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। 

 

 क्या यह धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं है ?

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मेरे विचार में यहाँ धार्मिक आधार पर भेदभाव जैसी कोई बात नहीं है। यदि हम इस धारा में से अल्पसंख्यक शब्द निकाल देते है तो फिर हम गेजेट में क्या छापेंगे? हम यह तो नहीं छाप सकते कि इन 3 देशो का कोई भी व्यक्ति यदि भारत में आकर रहने लग जाता है तो 6 साल बाद हम उसे नागरिकता दे देंगे !!

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पाकिस्तान अनस्टेबल हो चुका है और किसी भी समय ढह सकता है। अफगानिस्तान की स्थिति भी कमोबेश यही है। ये दोनों देश दशको से युद्ध / गृह युद्ध / मजहबी कट्टरपंथ / फौजी शासन की चपेट में है। न वहां पर काम धंधा है और न ही सुरक्षा। यदि हम पाकिस्तान / अफगानिस्तान / बांग्लादेश के "सभी" नागरिको के लिए भारत को खोल देते है तो जल्दी ही भारत में इन देशो से बड़े पैमाने पर लोग आना शुरू करेंगे और यह संख्या कुछ ही दशको में करोड़ो तक पहुँच जायेगी। और जब भी वे आयेंगे तब "उत्पीड़न" इसकी वजह बता देंगे। हमारी अर्थव्यवस्था इतना वजन नहीं उठा सकती।

मतलब हम विदेशियों को पनाह देने के चक्कर में अपने देश की बैंड नहीं बजा सकते है। अल्पसंख्यको को पनाह देने की वजह वाजिब है, और तीन एडजस्टमेंट हम कर सकते है। प्रोब्लम यह नहीं है कि हमें कितनो को पनाह देनी है, प्रोब्लम यह है कि हमें कितनो को पनाह देनी पड़ सकती है !!

हालांकि यहाँ अर्थव्यवस्था से ज्यादा बड़ी वजह सुरक्षा है। अफगानिस्तान से उखड़ने के बाद अल क़ायदा ने असम में अपना सेट अप बनाने के प्रयास करने शुरू कर दिए थे। आप गूगल करेंगे तो आप इस बारे में और भी जानकारी मिलेगी। इसके अलावा पाकिस्तान भी असम में बांग्लादेशी घुसपेठियो को बन्दुक बनाना सिखाने के लिए फंडिंग कर रहा है। यदि हम विदेशी मुस्लिमो को पूर्वोत्तर में आने देते है तो वे यहाँ पर एक प्रकार का डिस्टर्बेंस शुरू करेंगे और इसकी वजह से पेड मीडिया को यह मौका मिलेगा कि वे भारतीय मुस्लिमो एवं भारतीय हिन्दुओ के बीच तनाव बढ़ा सके !! ( जैसा कि अभी आप देख ही रहे है )

Shocking: Pakistani Gunsmiths Trained Locals In Bengal With State Police Blissfully Unaware

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और व्यवहारिक रूप से भी इन तीन देशो में अल्पसंख्यको का धार्मिक उत्पीड़न होना कोई सिर्फ थ्योरी नहीं है। आंकड़े यह बताते है कि अमुक देशो में हिन्दू आबादी तेजी से सिकुड़ रही है। तो मानवीय आधार पर जब हम इन्हें नागरिकता देते है तो पाकिस्तान / अफगानिस्तान / बांग्लादेश के मुसलमानों के साथ कोई भेदभाव नहीं करते। और जहाँ तक भारतीय मुसलमानो की बात है तो यह संशोधन भारत के किसी भी नागरिक को स्पर्श ही नहीं करता। न भारत के मुसलमानो को न भारत के हिन्दुओ को।

तो मेरे हिसाब से सरकार को यहाँ अल्पसंख्यक शब्द छापना जरुरी थी। जो लोग इसका विरोध कर रहे है, मैं उनसे पूछता हूँ कि आपके हिसाब से घुसपेठियो / शरणार्थीयों की समस्या को हल करने के लिए गेजेट में क्या छापना है , वह बताइये। और वे इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं देना चाहते।

 

(4) क्या यह संविधान के खिलाफ नहीं है ?

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पहली बात - संविधान की स्थिति एक कविता की तरह होती है। इसमें आप कुछ भी लिख दो इससे कुछ होता नहीं है। जिस आदमी के पास संविधान की व्याख्या करने का अधिकार रहेगा संविधान का अर्थ उसके मूड / मर्जी पर डिपेंड करता है। आप सुप्रीम कोर्ट का जज बदल दो, संविधान का अर्थ भी बदल जाएगा। मेरा मानना है कि संविधान की व्याख्या का अधिकार नागरिको के बहुमत के पास होना चाहिए, भ्रष्ट जजों के पास नहीं।

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एक नागरिक होने के नाते मेरी व्याख्या है कि यह बिल संवैधानिक है। अब आप कारण पूछेंगे तो मैं तकनिकी-कानूनी भाषा में 10-20 पन्नो की कोई भी स्टोरी ( तर्क ) लिखकर दे दूंगा। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के जज लिखकर देते रहते है। फिर यह सामान बुद्धिजीवियों की बहस के लिए कच्चे माल का काम करता है।

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दूसरी बात - भारत के संविधान में अल्पसंख्यक शब्द है, और अल्पसंख्यक होने का आधार धर्म को बनाया गया है !! भारत के संविधान का पहला पन्ना कहता है, भारत एक धर्म निरपेक्ष ( पंथ निरपेक्ष = धर्म निरपेक्ष सब एक ही है ) देश है। और उसी संविधान का चालीसवां पन्ना अल्पसंख्यक होने के लिए धर्म को आधार बनाता है। इसीलिए संविधान एक कविता है। जो मर्जी हो वह अर्थ आप खींच सकते हो। मतलब यह कि संविधान पर बहस करने का कोई पॉइंट ही नहीं है।

आप पूरे देश के मतदाता सूचियों में से 25 से 55 वर्ष के नागरिको की 500 लोगो की जूरी बुलाइए और इस जूरी के सामने यह बिल रखिये। फिर इस जूरी के सामने दोनों पक्ष अपने अपने तर्क रखें और फिर यह जूरी बहुमत से बताए कि यह फैसला संवैधानिक है या असंवैधानिक है। मैं व्याख्या के इस तरीके में मानता हूँ । दिल्ली के गुम्बज के निचे बैठा हुआ एक आदमी कैसे तय कर सकता है कि क्या संवैधानिक है और क्या नहीं !!

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तो नागरिक संशोधन बिल के माध्यम से मोदी साहेब ने 2 करोड़ के इस झुण्ड में से लगभग 20% ( सच्चे आंकड़े किसी के पास नहीं है। अत: यह एक अनुमान है जो विभिन्न एजेंसियों, रिपोर्ट्स एवं सरकारी प्रशासन द्वारा व्यक्त किया गया है।) उन लोगो को शरण दे दी है, जिन्हें इन 3 देशो में धार्मिक अल्पसंख्यक होने के कारण उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, और ये पलायन करके भारत आये।

(5) नागरिक संशोधन बिल पर मेरा स्टेंड : मैं इस बिल का आंशिक समर्थन करता हूँ। मोदी साहेब और श्री अमित शाह ( PM in waiting ) का धन्यवाद।

आंशिक समर्थन क्यों ?

इस बिल के लिए मेरे सुझाव :

5.1. धारा 2 में यह शब्द जोड़ा जाना चाहिए था - "जो ( एवं जिनके माता-पिता ) जन्मना"

इस शब्द को जोड़ने के बाद धारा इस तरह होती - "अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के अल्पसंख्यक समुदायों से संबंधित व्यक्ति जो (एवं जिनके माता-पिता जन्मना) - हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई हो"

यह क्यों जरुरी था ?.

यह संशोधन इन 3 देशो से आये हुए बहुसंख्यक मुस्लिमो को नागरिकता नहीं देता है। तो बांग्लादेश / पाकिस्तान से जितने भी घुसपैठिये भारत में आ चुके है और बरसों से यहाँ रह रहे है, उनके पास नागरिकता लेने के अब 2 विकल्प है --

  • या तो उन्हें हिन्दू बनना पड़ेगा या
  • फिर ईसाई।

कहने की जरूरत नहीं कि ये सभी मिशनरीज की तरफ चले जायेंगे। हालांकि बीजेपी=संघ की आई टी सेल एवं मिशनरीज द्वारा संचालित पेड मीडिया इसे यूँ प्रचारित करेगा कि इस बिल के आने बाद मुस्लिम हिन्दू धर्म में कन्वर्ट हो जायेंगे !!

 

5.2. नागरिकता देने का अधिकार नागरिको की जूरी को दिया जाना चाहिए था।

नागरिकता देने के धंधे में काफी पैसा है। क़ानून पास करने का मतलब यह नहीं है कि लोगो को मुफ्त में नागरिकता मिल जायेगी। वरिफिकेशन से लेकर कई सारी फोर्मल्टी होती है और हर चरण पर आवेदकों को अधिकारियों को पैसा देना पड़ेगा। और इसमें अधिकारी केस बाय केस पैसा लेते है। मतलब यदि आवेदक के पास ज्यादा पैसा है तो ज्यादा घूस देनी पड़ेगी और यदि पैसा नहीं है तो कम पैसे में काम हो जाएगा।

5.2.1. एक पाकिस्तानी नागरिक X का उदाहरण लीजिये - X पाकिस्तान के एयर फ़ोर्स अधिकारी एवं राजनयिक का बेटा था। वह लगभग 10 वर्षो से भारत की नागरिकता लेने का प्रयास कर रहा था। 2012 में तब कोंग्रेस सत्ता में थी और उनके मंत्रियो ने कई करोड़ में नागरिकता देने का सेटलमेंट भी कर लिया था। किन्तु बीजेपी=संघ के नेताओं ने इसका विरोध करना शुरू किया।

उनका तर्क था कि — पाकिस्तानी सेना में आला पद पर रहे व्यक्ति के पुत्र को नागरिकता देना सुरक्षा की दृष्टी से ठीक नहीं है। पाकिस्तान X के माध्यम से भारत में बड़े पैमाने पर जमीन खरीदने, नेताओं / एनजीओ / मीडिया को फंडिंग करने / जासूसी आदि में निवेश करके भारत में एक जमीनी नेटवर्क खड़ा कर सकता है।

तर्क वाजिब था, अत: संघ=बीजेपी के नेता / कार्यकर्ताओ के दबाव में अंतत: कोंग्रेस को X की नागरिकता की अर्जी खारिज करनी पड़ी।

लेकिन जब बीजेपी सत्ता में आई तो X ने फिर से लॉबीन्ग करना शुरू किया, और 2016 में बीजेपी ने X को नागरिकता दे दी !! चूंकि गले का सुरीला होना एक वाजिब वजह नहीं है अत: ज्यादातर सम्भावना है कि X ने सरकार में बैठे मंत्रियो को मोटा पैसा चुकाया होगा !!

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5.2.2. एक और उदाहरण देखिये - 2018 की बात है जब अधिकारियों ने मीडिया को हफ्ता भेजने की राशि में कटौती कर दी थी। पेड दैनिक भास्कर ने नागरिकता देने के एवज में वसूले जा रहे मामलो के सबूत जुटाए और इन्हें अख़बार में प्रकाशित कर दिया।

अब जिस तरह थाने-तहसील-कोर्ट में आप कितनी घूस दे रहे हो वह पेड मीडिया में रिपोर्ट नहीं होता उसी तरह से यह भी रिपोर्ट नहीं होगा कि नागरिकता के लिए अधिकारी-मंत्री कितना पैसा वसूल रहे है। और वैसे भी यहाँ आवेदकों को गरज है। तो वे बिना किसी हुज्जत के पैसा देंगे।

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मेरे विचार में यह अधिकार नागरिको की जूरी को दिया जाना चाहिए कि वे "धार्मिक आधार पर उत्पीड़न" होने पर किसी व्यक्ति को नागरिकता देने का फैसला कर सके। यदि हम यह अधिकार नागरिको की जूरी को दे देते है तो हमें किसी धर्म का नाम इबारत में छापना नहीं पड़ता है। जूरी अपने आप अल्पसंख्यको को नागरिकता देगी और इन देशो से आ रहे बहुसंख्यको के दावे को खारिज कर देगी। मतलब जूरी केस बाय केस यह फैसला कर सकती है कि किस मामले में नागरिकता देनी चाहिए और किस मामले में नहीं।


खंड - C

(1) नेशनल सिटिजन रजिस्टर ( NRC) :

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शरणार्थियों को नागरिकता देकर CAB उपरोक्त समस्या के एक हिस्से का समाधान कर देता है। अब बड़ी एवं गंभीर समस्या है कि हमें लगभग डेढ़ करोड़ घुसपेठियो का क्या करना है।

1.1. क्या इन्हें खदेड़ना जरुरी है ?

मेरा स्टेंड है कि यह भारत की दूसरी सबसे बड़ी समस्या है। मतलब हम सीधे असम समेत पूरा पूर्वोत्तर गँवा देंगे !! और यदि नहीं भी गंवाएंगे तो हमें इसे अपने नियंत्रण में बनाए रखने के लिए वर्षो लम्बा आंतरिक गृह युद्ध लड़ना पड़ सकता है। और वैसे भी यदि कोई व्यक्ति विदेशी है और जिस देश से आया है उस देश में अल्पसंख्यक नहीं है, और न ही वह अपने देश में धार्मिक उत्पीडन का सामना कर रहा है, तो वह यहाँ पर लेने क्या आया है, और हम उसे यहाँ क्यों रखे ? हमें ऐसे विदेशी से क्या लेना देना है जो अपने मुल्क में धार्मिक उत्पीड़न का सामना नहीं करने के बावजूद भारत में बिना कागजो के अवैध रूप से रह रहा है। हमें इन्हें निकाल देना चाहिए।

बीजेपी=संघ के नेताओ के अनुसार NRC घुसपेठियो की समस्या का समाधान करेगा। किन्तु जैसा की नजर आ रहा है, NRC ड्राफ्ट का बांग्लादेशी घुसपेठियो को "खदेड़ने" से कोई लेना देना बनता दिख नहीं रहा। यह ड्रामा बांग्लादेशी घुसपेठियो को बसाये रखने और उन्हें न खदेड़ने के लिए पिछले कई दशको से चलाया जा रहा है। कोंग्रेस और स्थानीय पार्टियों ने इस मुद्दे पर काफी वोट बटोरे और अब इस रजिस्टर को संघ=बीजेपी ने उठा लिया है।

1.2. NRC ड्राफ्ट क्या है ?

NRC ड्राफ्ट मतदाताओ की एक सूची है जो यह निर्धारित करती है कि 24 मार्च 1971 तक असम की मतदाता सूचियों में किनका नाम था और किनका नाम नहीं था। बस यह इतना ही है। ड्राफ्ट में इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है कि जिन लोगो के नाम इस सूची में नहीं है उन्हें कितने समय में देश से बाहर भेजा जाएगा और उन्हें क्या सजा मिलेगी या उनका क्या किया जाएगा !!

NRC शुरू हुआ तो सुप्रीम कोर्ट जज रंजन गोगोई ने कहा था कि —

We will see if it is fair or not. Then only we will decide. If something needs to be done, we will do it," ( मतलब, फाइनल फैसला हम ही करेंगे !! )

NRC में इतनी गड़बड़ियां है कि इस रजिस्टर के आधार पर कुछ तय नहीं किया जा सकता है, और न ही यह रजिस्टर निर्णायक है। यदि हमें 135 करोड़ के मुल्क में से डेढ़ करोड़ घुसपेठियो को ढूंढना है तो हमें सभी 135 करोड़ को हिलाने की जरूरत नहीं है। हम ऐसी प्रक्रिया बना सकते है कि शेष भारतीयों को किसी तरह की तकलीफ का सामना नहीं करना पड़ेगा। किन्तु टाइम पास करने के लिए असम में NRC लागू किया गया, और अब श्री अमित शाह पूरे देश में इसे लागू करने के बयान दे रहे है !!

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यह खुली हुई बात है कि असम में NRC असफल हो चुका है। लाखों घुसपैठिये फर्जी दस्तावेजों की सहायता से NRC में घुस चुके है, और लाखो वाजिब नागरिक NRC से बाहर है। जहाँ तक मैं देखता हूँ, NRC देश में लागू नहीं किया जाएगा, और यदि यह लागू भी किया गया तो यह बुरी तरह से असफल रहेगा। किन्तु इस दौरान 10-20 साल का टाइम पास हो जाएगा। बीच बीच में सरकारे आती जाती रहेगी, कई प्रकार के विरोध प्रदर्शन होते रहेंगे, बीच बीच में यह रुकेगा, फिर शुरू होगा, फिर रुकेगा और इस बीच वे तरह तरह के नोटिफिकेशन निकालकर इन घुसपेठियो को NRC में डालते रहेंगे। लेकिन जितना NRC चर्चा में आएगा उतना ही भारतीय मुस्लिमो में पेनिक फैलेगा और बीजेपी=संघ के उतने ही वोट बढ़ेंगे।

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दुसरे शब्दों में, नेशनल रजिस्टर सिस्टम एक शाही ड्रामा है। यह नोट बंदी से भी बड़ा तमाशा है। इस ड्रामे को इस तरह से डिजाईन किया गया है कि अल्टीमेटली इससे सभी बांग्लादेशी घुसपेठियो को फर्स्ट राउंड में NRC में जगह मिलेगी और फिर शायद नागरिकता भी मिल जाए !! किन्तु पेड मिडिया इसे कवरिंग फायर देने के लिए कुछ यूँ रिपोर्ट कर रहा है कि यह रजिस्टर देश के कई मुसलमान नागरिको को भारत की नागरिकता से वंचित कर देगा।

1.3. घुसपेठियो को खदेड़ने के लिए प्रस्तावित समाधान ?

बांग्लादेशी घुसपेठियो को खदेड़ने के लिए हमारा प्रस्ताव निचे दिया गया है। यह प्रस्ताव 2008 में मनमोहन सिंह जी को भेजा गया था। फिर 2012 में इसे फिर से भेजा गया। 2014 में इसे संशोधित करके मोदी साहेब को भेजा गया। और तब से अब तक सैंकड़ो बार मोदी साहेब को यह भेजा जा चुका है। मेरा मानना है कि यह प्रस्ताव ज्यादा बेहतर है और सिर्फ 1 से 2 वर्षो में देश के सभी घुसपेठियो को देश से बाहर कर देगा।

इस ड्राफ्ट के गेजेट में आने से विपक्षी दलों, पेड मीडिया आदि के पास इसका विरोध करने की कोई वजह भी नहीं रहेगी। शून्य विरोध एवं बिना किसी को डिस्टर्ब किये हम निचे दी गयी प्रक्रिया द्वारा घुसपेठियो को खदेड़ सकते है। हमें सिर्फ 100-200 घुसपेठियो पर कार्यवाही करनी है। और बाकी के घुसपेठिये खुद ही देश छोड़ना शुरू कर देंगे। अब वे देश कैसे छोड़ेंगे और किस देश में जाएंगे इस बारे में उन्हें सोचना है।

यदि हम NRC बनाते है और लाल कीले पर चढ़कर कहते है कि हमने 1 करोड़ घुसपेठियो को चिन्हित करके लिस्ट बना ली है , तो इसका मतलब है कि अब आपको इन्हें नागरिकता देनी ही पड़ेगी !! क्योंकि बांग्लादेश किसी भी सूरत में इन्हें लेने वाला नहीं है !! तो NRC का मतलब एक ड्रामा खड़ा करना है, ताकि इस समस्या को ऐसी शक्ल दी जा सके कि यह लाइलाज हो जाए !!

1.4. बांग्लादेशी घुसपेठियों को खदेड़ने के लिए प्रस्तावित प्रक्रिया का सारांश :

मूल ड्राफ्ट 7 पृष्ठों का है, अत: यहाँ इसकी प्रक्रिया बताने वाली मुख्य धाराएं दी गयी है :

(1) प्रधानमंत्री घुसपैठियों और शरणार्थीयों मामलो के पर्यवेक्षण एवं अनुसन्धान के लिए एक राष्ट्रीय रजिस्ट्रार की नियुक्ति करेंगे, जिसे राष्ट्रीय रजिस्ट्रार ( NR ) कहा जाएगा। राष्ट्रीय रजिस्ट्रार राज्य रजिस्ट्रारों एवं जिला रजिस्ट्रारों की नियुक्ति करेगा।

(2) राष्ट्रीय रजिस्ट्रार / राज्य रजिस्ट्रार / जिला रजिस्ट्रार अस्थायी तौर पर अधिकतम 2 वर्षों के लिए केंद्र / राज्य सरकार से वांछित अधिकारियों को डेपुटेशन पर नियुक्त कर सकते है या प्रति नियुक्ति पर केंद्र या राज्य सरकार से अधिकारी ले सकते है | ये सभी अधिकारी वोट वापसी पासबुक के अधीन होंगे।

(3) प्रथम चरण - फ़ोन कॉल्स और अन्य जानकारी जुटा कर बांग्लादेशियों की सूची तैयार करना

  1. प्रधानमंत्री दूरसंचार विभाग को आदेश करेंगे कि वह राष्ट्रीय रजिस्ट्रार को पिछले 2 वर्षों में बांग्लादेश से किये गए और बांग्लादेश को किये गए सभी फ़ोन कॉल्स की सूची दे | इस विवरण का उपयोग करके राष्ट्रीय रजिस्ट्रार बांग्लादेशी संदिग्धों की सूची बनाएगा।
  2. कोई भी भारतीय नागरिक निजी या सार्वजनिक रूप से बांग्लादेशी संदिग्धों की सूची दे सकता है, और उसे ये सूची संदेह के आधार पर घटते क्रम में बनानी होगी | यदि सूची में 20% से भी कम त्रुटियाँ हुई, तब राष्ट्रीय रजिस्ट्रार उस व्यक्ति की इच्छानुसार उसे निजी या सार्वजनिक रूप से पारितोषिक दे सकता है।
  3. राष्ट्रीय रजिस्ट्रार अपने विवेक और प्राप्त की गयी श्रेष्ठतम के आधार पर भारत के प्रत्येक जिले में बांग्लादेशियों की अनुमानित संख्या बताएगा।
  4. राष्ट्रीय रजिस्ट्रार बांग्लादेश में एजेंटों की नियुक्ति करेगा | राष्ट्रीय रजिस्ट्रार अपने एजेंटों से भारत में रह रहे संदिग्धों के बांग्लादेश में निवास कर रहे रक्त संबंधियों के ब्लड ग्रुप और डीएनए नमूनों की जानकारी जुटाने के लिए कहेगा | राष्ट्रीय रजिस्ट्रार एजेंटों से ऐसे दस्तावेज जुटाने के लिए भी कहेगा जो संदिग्धों के बांग्लादेशी मूल का होना प्रमाणित करें।
  5. राष्ट्रीय रजिस्ट्रार संदिग्धों के नाम, चित्र और अन्य जानकारी सरकारी वेबसाइट पर रख सकता है, और उनके बांग्लादेशी संबंधियों के नाम और अन्य जानकारी देने के लिए सभी से निवेदन भी कर सकता है।
  6. दुसरे चरण में राष्ट्रीय रजिस्ट्रार उन संदिग्धों की सूची तैयार करेगा जिनके बांग्लादेशी होने पर वह आश्वस्त है।

(4) जिला पुलिस प्रमुख फोन बिल के आधार पर एवं टेलीकोम कम्पनियों से समन्वय बनाकर उन लोगो को चिन्हित करेगा जो सामान्यतया बांग्लादेश फोन करते रहते है। संदेह के आधार पर पुलिस प्रमुख इनके नाम एवं छाया चित्र वेबसाईट पर प्रकाशित कर सकेगा। इसके लिए पुलिस प्रमुख को वोट वापसी पासबुक के अधीन लाना होगा, वर्ना वह घुसपेठियो से घूस वसूलेगा और उन्हें छोड़ देगा।

(5) पुलिस प्रमुख बांग्लदेशी घुसपेठिये की पहचान के सबूत जुटाने के लिए 100,000 रू तक की इनामी राशि घोषित करेगा। यदि बांग्लादेश में रहने वाला उसका कोई रिश्तेदार ब्लड सेम्पल देने को तैयार हो जाता है तो पुलिस प्रमुख डीएनए पुष्टि के लिए कार्यवाही करेगा।

(6) अब इस मामले की सुनवाई करने के लिए अमुक जिले की मतदाता सूची में से 15 नागरिको की जूरी बुलाई जायेगी। ब्लड सेम्पल की जांच , सार्वजनिक नारको टेस्ट एवं लाइ डिक्टेटर टेस्ट के नतीजो के आधार पर जूरी यह तय करेगी कि अमुक व्यक्ति घुसपेठिया है या नहीं।

(7) प्रधानमंत्री गेजेट में यह अधिसूचना प्रकाशित करेंगे कि यदि व्यक्ति घुसपेठिया साबित हो जाता है तो उसे 3 वर्ष से 20 वर्ष तक के लिए जेल भेजा जा सकता है।

मौजूदा क़ानून कहता है कि , यदि कोई गैर भारतीय नागरिक पासपोर्ट के लिए आवेदन करता है तो यह कारावास से दंडनीय अपराध है। हमें यह प्रावधान राशन कार्ड , वोटर कार्ड एवं आधार कार्ड में भी जोड़े जाने की जरूरत है।

यदि हम 6 महीने के भीतर 200 घुसपेठियों को भी जेल पहुंचा देते है तो 95% घुसपेठिये देश छोड़कर भाग जायेंगे और वापिस लौट कर नहीं आयेंगे। जब हम उनके साथ इस तरह की ट्रीटमेंट करेंगे तो यह उनकी समस्या होगी कि वे भारत छोड़ कर कहाँ जायेंगे। रोहिंग्यो को खदेड़ने के लिए भी ऊपर दी गयी प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाएगा।

यदि हम इस तरह की प्रकिया को लागू करते है तो भारतीय मुसलमानों में कोई पैनिक नहीं फैलेगा और न ही वे इसका विरोध करेंगे। क्योंकि जहाँ तक मैं देखता हूँ भारत के आम मुस्लिम नागरिको को भी इन घुसपेठियो से कोई लेना देना नहीं है, और न ही वे इन्हें देश में बनाए रखने का समर्थन करेंगे। अभी पेड मीडिया उनमे पैनिक फैला रहा है, और इस वजह से वे NRC & CAB को संदेह की नजरो से देख रहे है।

जहाँ तक मानवाधिकार गैंग और पेड बुद्धिजीवियों , राजनैतिक दलों, पेड कलाकारों आदि की बात है तो हमें इनके विरोध पर ध्यान नहीं देना चाहिए। ये अपना गाना गाते रहेंगे और नागरिको की जूरी घुसपेठियो को बाहर भेजती रहेगी। जब फैसला नागरिको की जूरी करती है तो यह अपने आप डेमोक्रेटिक हो जाता है, और अन्य देश भी मानवाधिकार टाइप का अडंगा इसमें नहीं लगा पायेंगे।

NRC पर मेरा स्टेंड : NRC टाइम पास करने के लिए लाया गया है, ताकि रोहिंग्यो एवं बांग्लादेशी घुसपेठियो को निकालने के क़ानून को टाला जा सके। यदि हमें घुसपेठियो को खदेड़ना है तो ऊपर दी गयी इबारत को गेजेट में निकालना चाहिए। रोहिंग्यो को भारत में आये हुए 7 वर्ष बीत चुके है !! मोदी साहेब ने सत्ता में आने के बाद 6 साल तक इन्हें खदेड़ने के लिए गेजेट में कोई इबारत नहीं छापी, और इस तरह 6 साल का टाइम पास हो गया। इसी तरह की बहस चलाकर उन्होंने 30 साल तक टाइम पास करके बांग्लादेशी घुसपेठियो को भारत में सेट कर दिया है !! यदि उपरोक्त कानून गेजेट में छप जाता है तो NRC जारी रहता है या नहीं इससे मुझे कोई सरोकार नहीं है।